तेरे ग़मों की डली बनाकर ज़ुबाँ पे रख ली है देखो मैंने वो क़तरा क़तरा पिघल रही है, मैं क़तरा क़तरा ही जी रहा हूँ इन आँखों की खामोश सिलवटों में, लबों की शर्माई करवटों में रुकी हुयी एक आह दिल में, ज़हर मैं कितना जा पी रहा हूं … मैं क़तरा क़तरा ही जी [...]
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सहमी सी इक नज़्म के सहमे हुये अल्फ़ाज़ कतरों में सिमटती हुई, मन की इक आवाज़ आँखों में सर्द रोशनी की आख़री किरन दम तोड़ते हुये दिल की आख़री धड़कन बस एक इनायत की नज़र कर तो दो सरकार जीना तो था बेकार यहाँ, मौत तो हो साकार ! ज़ालिम तेरे ज़ुल्मों कि ये अब [...]