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तीर पर कैसे रुकूँ मैं

तीर पर कैसे रुकू मैं आज लहरों में निमंत्रण! रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलतें हैं सितारे वक्ष पर युग बाहु बाँधे, मैं खड़ा सागर किनारे, वेग से बहता प्रभंजन केश पट मेरा उड़ाता, शून्य में भरता उदधि-उर की रहस्यमयी पुकारें; इन पुकरों की प्रतिध्वनि हो रही मेरे ह्रदय में, है प्रतिच्छायित जहाँ पर सिंधू [...]

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Anand

In one of the most poignant scenes in Bollywood history, a hyperventilating Rajesh Khanna says to a massively worried Amitabh Bachchan, 'जो खत्म हो रहा है वो शरीर है।' (That which is ending is the body) and follows it up with one of the most beautiful poems I've ever come across: मौत तू एक कविता [...]

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नाउम्मीद

तेरे ग़मों की डली बनाकर ज़ुबाँ पे रख ली है देखो मैंने वो क़तरा क़तरा पिघल रही है, मैं क़तरा क़तरा ही जी रहा हूँ इन आँखों की खामोश सिलवटों में, लबों की शर्माई करवटों में रुकी हुयी एक आह दिल में, ज़हर मैं कितना जा पी रहा हूं ... मैं क़तरा क़तरा ही जी [...]

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uff...

सहमी सी इक नज़्म के सहमे हुये अल्फ़ाज़ कतरों में सिमटती हुई, मन की इक आवाज़ आँखों में सर्द रोशनी की आख़री किरन दम तोड़ते हुये दिल की आख़री धड़कन बस एक इनायत की नज़र कर तो दो सरकार जीना तो था बेकार यहाँ, मौत तो हो साकार ! ज़ालिम तेरे ज़ुल्मों कि ये अब [...]

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