ज़िंदगी आज नाउम्मीद थोड़ी कम होती
गर तेरी आँखें उस दिन कुछ नम होतीं
ये सोच के कि तू भी कभी याद करती होगी
मैं तो जीने को तय्यार था
लेकिन उस दिन तेरी मुस्कुराहट में
न संवेदना थी न प्यार था
कुछ कहते कहते ही रुक गया मैं
वरना ज़िंदगी मेरी भी खुश सनम होती
गर तेरी आँखें उस दिन कुछ नम होतीं
इस लिये खड़ा रहा कि
मुड़ के देखोगी एक बार
लिये दिल में एक अनसुनी आह
आँखों में धूल का गुबार
सूखे होठों पे सहमी सी चाह में
झलकती मौत की ज़िंदगी कुछ कम होती
गर तेरी आँखें उस दिन कुछ नम होतीं
4 Comments
short and sweet!
-nitin
@ankit: Bohot khoobsurat likha aapne...bohot zyaada khoobsurat...
@नितिन : आपसे ही सीखा है
@आबेराह : इस नवाज़िश के लिये शुक्रिया
subhanallah, mere shayar, subhanallah
-nikux